Uniform Civil Code | UCC in Uttrakhand

What is Uniform Civil Code (UCC)?

  • यूनिफॉर्म सिविल कोड का मतलब है कि हर धर्म, जाति, संप्रदाय, वर्ग के लिए पूरे देश में एक ही नियम. दूसरे शब्‍दों में कहें तो UCC पूरे देश में सभी धार्मिक समुदायों सहित उनके व्यक्तिगत मामले जैसे marriage, divorce, inheritance, adoption आदि के लिए एक कानून प्रदान करेगा।
  • संविधान के अनुच्छेद-44 में भारतीय क्षेत्र के सभी नागरिकों के लिए UCC अर्थात समान कानून लागू करने की बात कही गई है|

Origin of UCC

  • ब्रिटिश भारत में 1835 की एक रिपोर्ट में पहली बार UCC का जिक्र किया गया । इस रिपोर्ट में भारतीय संहिताकरण में एकरूपता की आवश्यकता पर बल दिया गया अपराधों, सबूतों और ठेके जैसे मुद्दों पर समान कानून लागू करने की जरूरत है. इस रिपोर्ट में हिंदू-मुसलमानों के धार्मिक / व्यक्तिगत कानूनों को इस कानून से बाहर रखा।
  • व्यक्तिगत मुद्दों से निपटने वाले कानून के लिए 1941 में हिंदू कानून पर संहिता बनाने के लिए B N Rau समिति का गठन किया गया।
    • Hindu Succession Act, 1956: बी.एन. राऊ समिति के आधार पर हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम (1956) में हिंदुओं, बौद्धों, जैनियों और सिखों के उत्तराधिकार मामलों को सुलझाने के लिए हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम विधेयक को अपनाया गया. हालांकि, मुस्लिम, ईसाई और पारसियों लोगों के लिये अलग कानून रखे गए थे.

What is the need of UCC?

यूसीसी के लागू होने से सभी नागरिकों के साथ समान व्यवहार किया जाना चाहिए और देश (भारत जहां विभिन्न धर्मों के लोग रहते हैं) में धार्मिक विभाजन को कम करने में मदद मिलेगी। यूसीसी को लागू करने से कमजोर वर्गों को सुरक्षा मिलेगी, कानून सरल होंगे।

UCC in Uttrakhand

उत्तराखंड में 2022 के चुनाव में भाजपा ने यूसीसी के मुद्दे को सर्वोपरि रखते हुए वादा किया था कि सरकार बनते ही इस पर काम किया जाएगा। उत्तराखंड भाजपा सरकार ने यूसीसी के लिए कमेटी का गठन किया। जिसने डेढ़ साल में यूसीसी का ड्राफ्ट तैयार किया। उत्तराखंड विधानसभा में पांच फरवरी 2024 से शुरू के विशेष सत्र में UCC को उत्तराखंड में लागू किया गया। इसके साथ की आजादी के बाद देश में उत्तराखंड UCC लागू करने वाला पहला राज्य बन गया है।

Important point of Uttarakhand Uniform Civil Code Bill

जाति, धर्म व पंथ के रीति-रिवाजों से छेड़छाड़ नहीं

  • UCC विधेयक में शादी, तलाक, विरासत और गोद लेने से जुड़े मामलों को ही शामिल किया गया है। इस विधेयक में विभिन्न जाति, धर्म अथवा पंथ की परंपराओं और रीति रिवाजों से कोई छेड़छाड़ नहीं की गई है। वैवाहिक आदि प्रक्रिया में धार्मिक मान्यताओं पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा। धार्मिक रीति-रिवाज जस के तस रहेंगे। खान-पान, पूजा-इबादत, वेश-भूषा पर भी कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।

शादी का पंजीकरण कराना अनिवार्य

  • विधेयक में 26 मार्च वर्ष 2010 के बाद से हर दंपती के लिए तलाक व शादी का पंजीकरण कराना अनिवार्य होगा।
  • विवाह के लिए लड़के की न्यूनतम आयु 21 और लड़की की 18 वर्ष तय की गई है।
  • महिलाएं भी पुरुषों के समान कारणों और अधिकारों को तलाक का आधार बना सकती हैं।

संपत्ति में बराबरी का अधिकार

  • संपत्ति में बेटा और बेटी को बराबर अधिकार मिलेगा ।
  • जायज और नाजायज बच्चों में कोई भेद नहीं होगा। नाजायज बच्चों को भी उस दंपती की जैविक संतान माना जाएगा।
  • समान नागरिक संहिता में गोद लिए हुए बच्चों, सरोगेसी द्वारा जन्मे बच्चों और असिस्टेड रीप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजी द्वारा पैदा हुए बच्चों में कोई भेद नहीं होगा. इन्हे भी जैविक संतान का दर्जा मिलेगा.

लिव इन रिलेशनशिप का पंजीकरण कराना अनिवार्य

  • लिव इन में रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति के लिए वेब पोर्टल पर पंजीकरण अनिवार्य होगा।
  • युगल पंजीकरण रसीद से ही किराया पर घर, हॉस्टल या पीजी ले सकेंगे।
  • लिव इन में पैदा होने वाले बच्चों को जायज संतान माना जाएगा और जैविक संतान के सभी अधिकार मिलेंगे।
  • लिव इन में रहने वालों के लिए संबंध विच्छेद का भी पंजीकरण कराना अनिवार्य होगा।