असहयोग आंदोलन : NON-COOPERATION MOVEMENT

असहयोग आंदोलन (NON-COOPERATION MOVEMENT)

भारत की स्वतंत्रता के लिए ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ भारतीय लोंगो और नेताओ के द्वारा कई बड़े आंदोलन किये गए इन आंदोलन मे से एक ‘असहयोग आंदोलन’ (Non Cooperation Movement in Hindi) भी था। इस आंदोलन का नेतृत्व राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने किया था। जिसमें ‘डॉ राजेन्द्र प्रसाद’, ‘सरदार वल्लभभाई पटेल’, ‘सुभाष चंद्र बोस’, ‘लाला लाजपत राय’ और ‘मौलाना मोहम्मद अली’ आदि कई बड़े नेताओं ने हिस्सा लिया था।
Non Cooperation Movement (असहयोग आंदोलन) 1 अगस्त 1920 को शुरू किया गया था। यह एक अहिंसक आंदोलन था। इस आंदोलन के उद्देश्य ब्रिटिश उत्पादों के उपयोग को समाप्त करने, ब्रिटिश पदों से इस्तीफा लेने या इस्तीफा देने, सरकारी नियमों, अदालतों आदि पर रोक लगाने आदि थे।

असहयोग आंदोलन के कारण ( Causes of Non-Cooperation Movement )

  1. जलियांवाला बाग हत्याकांड –  13 अप्रैल 1919 को अमृतसर में जलियांवाला बाग में ब्रिटिश सरकार और भारत के लोकप्रिय नेताओं (जैसे डॉ. सैफुद्दीन किचलू और डॉ. सत्यपाल ) की गिरफ्तारी के विरोध में एक सभा का आयोजन किया गया था। जहाँ एक निहत्थे भीड़ का एक विशाल जमावड़ा था। इस सामूहिक विरोध के दौरान निहत्थे भीड़ पर जनरल डायर के आदेश से पुलिस द्वारा गोलियां चलायी गईं जिसमे कई लोग मारे गए और घायल भी हुये और इस नरसंहार के बाद पूरे पंजाब में मार्शल लॉ घोषित कर दिया गया।
    जलियांवाला हत्याकांड के बाद इस घटना के कारणों और स्थिति के जांच के लिए एक समिति का गठन किया गया । इस समिति का नेतृत्व लॉर्ड विलियम हंटर ने किया और इस समिति को हंटर कमीशन के नाम दिया गया और इस समिति ने जलियांवाला बाग हत्याकांड के लिए जनरल डायर को जिम्मेदार पाया।
    लेकिन भारतीयों ने स्पष्ट पक्षपात के कारण हंटर समिति की सिफारिशों को स्वीकार नहीं किया। इसलिए, इस हत्याकांड और हंटर कमीशन का विरोध करने के लिए, महात्मा गांधी ने ब्रिटिश सरकार द्वारा उन्हें दी गई क़ैसर-ए-हिन्द की उपदधि को वापस करने का फैसला किया।
  2. रौलट एक्ट – रौलट एक्ट 1919 में पेश किया गया था। इस अधिनियम के अनुसार , ब्रिटिश सरकार आतंकवाद के संदिग्ध किसी भी व्यक्ति को बिना मुकदमे और उचित परीक्षण के अधिकार के के बिना अधिकतम दो साल तक जेल में रख सकते थे। इस अधिनियम ने भारत के सभी स्तरों पर असहयोग अधिनियम को एक नई दिशा दी।
  3. प्रथम विश्व युद्ध – विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटिश पक्ष से लड़े भारतीय व भारतीय सैनिक की भागीदारी के परिणामस्वरूप भारत के लोगों को बहुत नुकसान हुआ। प्रथम विश्व युद्ध के कारण भारतीय लोगो को आर्थिक कठिनाइयाँ का सामना करना पड़ा। जिस कारण सरकार के खिलाफ जनता में आक्रोश पैदा हुआ ।
  4. खिलाफत आंदोलन – उस समय मुसलमानों का धार्मिक प्रमुख टर्की का सुल्तान माना जाता था। प्रथम विश्व युद्ध में जब टर्की को अंग्रेजों ने हराया था। तब मुसलमानों लोगो और मुस्लिम नेताओ द्वारा ब्रिटिश शासन के खिलाफ खिलाफत आंदोलन शुरू किया गया था। इस आंदोलन ने हिंदुओं और मुसलमानों के बीच एकता का कार्य किया क्योंकि खिलाफत आंदोलन के नेता असहयोग आंदोलन में शामिल हो गए।

असहयोग आंदोलन का प्रारंभ

  • 1 अगस्त, 1920 को असहयोग आंदोलन प्रारंभ हुआ और दुर्भाग्यवश इसी दिन लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक की मृत्यु भी हो गई थी।
  • सितंबर 1920 में कोलकाता में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का विशेष अधिवेशन हुआ जिसमे असहयोग आंदोलन संबंधी प्रस्ताव प्रस्तुत किया गया था। इसके बाद दिसंबर 1920 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन नागपुर में आयोजित हुआ था। इस अधिवेशन के दौरान असहयोग आंदोलन के प्रस्ताव की पुष्टि कर दी गई थी और आधिकारिक तौर पर असहयोग आंदोलन प्रारंभ हो गया था।
  • कांग्रेस ने अपने नागपुर के वार्षिक अधिवेशन में दो प्रमुख निर्णय लिए थे। इनमें से पहला तो था कि ब्रिटिश शासन के भीतर स्वशासन की मांग का परित्याग करना और उसके स्थान पर स्वराज को अपना लक्ष्य घोषित करना। इसके अलावा, दूसरा निर्णय यह था कि कांग्रेस ने असहयोग आंदोलन के दौरान किए जाने वाले रचनात्मक कार्यों की सूची तैयार की और उन्हीं कार्यों के इर्द-गिर्द असहयोग आंदोलन का संचालन किया जाना था।

चौरी चौरा कांड और असहयोग आंदोलन की वापसी

फरवरी, 1922 को उत्तर प्रदेश के वर्तमान गोरखपुर चौरी चौरा नामक स्थान पर एक हिंसक भीड़ ने पुलिस चौकी पर हमला कर दिया और उसे आग के हवाले कर दिया। इसके परिणाम स्वरूप लगभग 20 पुलिसकर्मी मारे गए। इस घटना को इतिहास में चौरी चौरा कांड के नाम से जाना जाता है। असहयोग आंदोलन एक अहिंसक आंदोलन था। लेकिन चौरी चौरा घटना के कारण रुष्ट होकर गांधी जी ने फरवरी, 1922 को बारदोली में कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में असहयोग आंदोलन को वापस लेने की घोषणा की और इसके साथ ही असहयोग आंदोलन समाप्त हो गया।

असहयोग आंदोलन का प्रभाव

चौरी चौरा कांड के बाद असहयोग आंदोलन समाप्त हो गया और असहयोग आंदोलन एक असफल आंदोलन रहा लेकिन इस आंदोलन से भारतीय लोगो पे कुछ प्रभाव छोड़ दिए।

  • इस आंदोलन ने लोगों में ब्रिटिश विरोधी भावना विकसित की जिसके कारण लोग ब्रिटिश शासन से छुटकारा पाने की कोशिश कर रहे थे।
  • जब खिलाफत आंदोलन को Non Cooperation Movement में मिला दिया गया, तो इससे हिंदुओं और मुसलमानों में एकता आई।
  • ब्रिटिश वस्तुओं का बहिष्कार और खादी उत्पादों का प्रचार।
  • यह पहला आंदोलन था जिसमें बड़े पैमाने पर लोगों ने भाग लिया, इसने विभिन्न श्रेणियों के लोगों जैसे किसानों, व्यापारियों आदि को विरोध में एक साथ लाया।